Notes from a Dhamma service workshop held at Dhamma Pala, Bhopal (Dhammapal News, April 2012). These notes are available in Hindi only; the video below is in English.
धम्मपाल न्यूज़ (धम्मपाल विपश्यना केन्द्र, भोपाल का समाचार पत्र) · अप्रैल 2012
Video — Benefits of Dhamma Service (S. N. Goenka)
धम्मवाणी
क तमे द्वे पुग्गला दुल्लभा लोकस्मिं ?
यो च पुब्बकारी, यो च कतञ्ञू कतवेदी —
इमे द्वे पुग्गला दुल्लभा लोकस्मिं।
— दुक पुग्गलपञ्ञत्ति – 39
संसार में कौन से दो पुद्गल (व्यक्ति) दुर्लभ हैं? वह जो पूर्व उपकारी है, बिना किसी अपेक्षा के उपकार की पहल करने वाला है और वह जो कृतज्ञ है, कृतवेदी है। ये दो व्यक्ति संसार में दुर्लभ हैं।
भगवान बुद्ध ने कहा है कि मनुष्यों में ये दो सद्गुण दुर्लभ हैं — कतञ्ञुता अर्थात कृतज्ञता और पुब्बकारिता अर्थात बिना किसी अपेक्षा के उपकार करने की पहल। ये दोनों ऐसे सद्गुण हैं जो किसी भी धर्मप्रेमी व्यक्ति की धर्मपथ पर प्रगति मापने के लिए सही मापदण्ड हैं। — कल्याण मित्र सत्यनारायण गोयन्का
धम्मसेवा पर कार्यशाला — स्वर्णिम बिन्दु
धम्मपाल विपश्यना केन्द्र, भोपाल पर 3–4 मार्च 2012 को धम्मसेवा पर एक कार्यशाला हुई। दस दिवसीय शिविर के दौरान किये जाने वाले विभिन्न सेवा कार्य तथा धम्मसेवा के अन्य पहलुओं पर विचार–विमर्श हुआ। कार्यशाला का सार यहाँ प्रस्तुत है, जो सभी साधकों के लिए प्रेरणास्पद है।
सेवा क्यों देनी चाहिए?
- अपने स्वार्थ के लिए।
- किसी और पर नहीं, अपने आप पर एहसान करने के लिए।
- अपनी पारमिताएँ पुष्ट करने के लिए।
- साधना हमें स्वावलंबी बनाती है, परावलंबी नहीं। सेवा, साधना की पूरक है। साधना तो हमें पुष्ट करना ही है, पर सेवा हमें धर्म में और भी मजबूत बनाती है।
- दसों पारमिताओं को पूरा करने के लिए सेवा ही सर्वोत्तम साधन है।
- मुक्ति का पथ दिखाने वाले गुरुजनों एवं हमारे पूर्व शिविरों में जिन्होंने सेवा दी, उनके ऋण से मुक्त होने एवं उनके प्रति कृतज्ञता दर्शाने का धम्मसेवा एक उपाय है।
- सेवा से मैत्री को सबल बनाते हैं। साधना व सेवा दोनों से ही मन की गाँठें खुलेंगी। केवल साधना से मुक्ति नहीं मिल सकती। साधना और धम्मसेवा साथ–साथ चलनी चाहिए। कर्म संस्कारों की जड़ों को काटने वाली साधना (कुल्हाड़ी) की धार धर्मसेवा से ही तेज हो सकती है। धर्मसेवा से दसों पारमिताएँ बढ़ती हैं। इनमें से खंती (सहिष्णुता) एवं मैत्री की पारमी बहुत अधिक मात्रा में बढ़ती है।
हर व्यवहार में मैत्री
धम्मसेवक का मैत्री एवं मुदिता का बटन 24 घंटे ऑन रहना चाहिए — सेवा देने के लिए घर से निकलते समय से शिविर समाप्त होकर घर पहुँचने तक। धम्मसेवक का चित्त मैत्री से लबालब भरा हो और हमारे हर व्यवहार में मैत्री झलकनी चाहिए, जैसे —
- जीरो डे पर साधक के केन्द्र पर आगमन होते ही हमारे मन में यह भाव आए कि इनके पुण्यों का उदय हो रहा है, इसलिए शिविर करने आए हैं। ये सभी अपनी–अपनी साधना में खूब सफल हों, अपने दुःखों से मुक्त हों।
- आनापान सत्र समाप्त होते ही हमें धम्महॉल के बाहर इस प्रकार खड़े होना चाहिए कि साधक आवश्यकता होने पर हमें ढूँढ सके। आज साधकों का पहला दिन है, हो सकता है उन्हें व्यवस्था संबंधी कोई कठिनाई हो, तो मुझे सेवा के लिए तत्पर रहना है — यह भाव मन में हो।
- साधना की हर बैठक में तथा प्रवचन में हर साधक उपस्थित हो गया है, यह सुनिश्चित करना चाहिए। भले ही बैठक 5–10 मिनट देर से प्रारम्भ हो, लेकिन कोई साधक महत्वपूर्ण निर्देश सुनने से वंचित न रह जाए — हमारा ऐसा करुणापूर्ण चित्त हो।
- सदा प्रसन्नता से सेवा दें। मन में जरा भी दुर्भाव नहीं आने दें, नहीं तो दूषित तरंगें फैलाने का काम करने लगेंगे। दूषित चिंतन प्रारम्भ होते ही उस पर रोक लगानी चाहिए, उसे बढ़ने नहीं देना चाहिए। हमें केन्द्र पर दूषित तरंगें नहीं फैलानी हैं — ऐसा दृढ़ निश्चय और अभ्यास करना चाहिए। जरा भी दुर्विचार नहीं आने पाए कि कोई साधक देखो कैसे खाता है, बार–बार सो जाता है, हमेशा देर से आता है आदि। हो सकता है साधक परेशान हो। कमजोर बच्चे को माँ हमेशा ज्यादा करुणा व प्यार देती है, इसी तरह कमजोर साधक को अधिक मैत्री देनी है।
- कम्पाउंडिंग करते समय भी हमारे चेहरे पर मुस्कराहट हो, कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। न जाने कौन सा शब्द उन्हें आहत कर दे (साधक से जितनी आवश्यक हो, उतनी ही बात करें)। मिलिटरी शासन जैसा काम नहीं करना है। आवश्यक बात है कि पूरा काम शुद्ध तरंगों के परिवेश में हो। समय की पाबंदी से अधिक महत्वपूर्ण है चित्त की चेतना। चित्त की चेतना को पूरे 10 दिन शुद्ध रखना है और हमें फेल नहीं होना है।
- भोजनालय में सेवा देते समय साधक के भोजन की मात्रा पर हमारा ध्यान नहीं होना चाहिए। यही मैत्री–भाव रहे कि “यह भोजन इनकी मुक्ति में सहायक हो”। सदैव यह चिंतन रहे कि कोई साधक भोजन से वंचित तो नहीं रह गया, कहीं उसे कोई परेशानी तो नहीं है — ऐसी करुणा व मैत्री हमारे मन में हो। इस प्रकार हम अपनी मैत्री की पारमी पुष्ट कर सकते हैं।
- साधक ही प्रमुख घटक है। साधक की सुविधा हमारी सुविधा से पहले है। साधकों का भोजन होने के उपरांत ही हमें भोजन करना है। इस प्रकार हमारे मन में हमेशा विनम्र भाव बना रहे। साधक ही प्रमुख है, साधक ही प्रधान है — ये लोग मुझे अपनी पारमिता व समता बढ़ाने के लिए सेवा का अवसर दे रहे हैं। अतः मुझे इनका कृतज्ञ होना चाहिए, इनका मंगल हो!
- हमारे व्यवहार से साधकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, हमारे हलन–चलन से उनका ध्यान भंग न हो, इसका ध्यान रहे। साधक हमारे प्रति आकर्षित हों — ऐसा भाव हमारे मन में नहीं होना चाहिए। सजग रहें कि कहीं अहंकार हमारे सिर पर हावी तो नहीं हो रहा है। जरा भी यह भाव न रहे कि 10वें दिन कोई हमारी प्रशंसा करेगा कि “क्या सेवा दी”, गले मिलेगा। यदि मन में ऐसा भाव आए तो समझें कि “मार” अपना काम कर रहा है। चित्त की निर्मलता प्रमुख है, बाकी सब गौण है। चित्त की शुद्धता से सेवा करनी है। चित्त की चेतना की शुद्धता निःस्वार्थ भाव से सेवा देने में है। दिखावट आई तो स्वार्थ की बू है।
- सारा काम व्यवहार से होगा। व्यवहार बोलेगा। साधक को लगना चाहिए कि जरूर धम्मसेवक ने साधना की है — यह धम्मसेवक मेरा कोई सगा–संबंधी नहीं है, फिर भी इतने प्यार से सेवा कर रहा है। साधक का चित्त ऋजु हो जाता है, वह धर्म में, साधना में लगन से लग जाता है। इस तरह हम उसके कल्याण में सहायक बन जाएँ।
- हमें (धम्मसेवकों को) आपस में सामंजस्य बनाए रखना है। हमें तो मिलजुल कर सबके भले के लिए काम करना है। हमेशा सजग रहें — दूसरे धम्मसेवक के प्रति जरा भी दुर्भाव नहीं आने पाए।
धम्मसेवा — जीवन में ध्यान
- यह आवश्यक है कि ध्यान जीवन का अभिन्न अंग बन जाए; यह कोई यांत्रिक क्रिया (mechanical activity) नहीं है। धम्मसेवा अन्य प्रकार की सेवा से भिन्न है। संवेदनाओं के प्रति सजग रहते हुए की गई सेवा ही वास्तविक धम्मसेवा है। इस प्रकार ध्यान का जीवन के साथ समन्वय स्थापित करने में धम्मसेवा सहायता करती है। धम्मसेवा व्यक्तिगत विकास व आध्यात्मिक उन्नति का सशक्त माध्यम है। सेवा करते हुए मैत्री, करुणा, समता एवं मुदिता को पुष्ट करना संभव है। वस्तुतः प्रभावशाली धम्मसेवा की यही कसौटी है।
- भावना ही प्रमुख है। भावना ही सेवा का प्राण है। अगर सेवा भाव है तो आयु, शारीरिक अक्षमता आदि भी धम्मसेवा में रुकावट नहीं बन सकतीं। यदि कोई व्हील चेयर पर है तो भी धम्मसेवा कर सकता है — बैठे–बैठे जो भी काम कर सकें, करें। मोद ही धर्म में आगे ले जाएगा। धर्मसेवा में उमंग रहे कि मैं कैसे इनकी मुक्ति में सहायक बनूँ।
- जीवन कितना बचा है? न जाने शरीर साथ देगा या नहीं, इसलिए जरा भी अवसर नहीं खोना है। न जाने फिर सेवा का भाव जागे, न जागे; परिस्थितियाँ साथ दें, न दें। इसलिए सेवा का अवसर न चूकें।
- जीवन में तूफान आएँगे ही। उनसे मुकाबला करने में शील, सेवा व दान की पारमी बहुत काम आती है।
- जहाँ हमें सुख–शांति की तरंगें मिलती हैं, उन स्थानों को, उस धर्म–मार्ग को पल्लवित करना हमारी जिम्मेदारी है — ऐसा हमारा संकल्प हो।
विपश्यना साधना की शुद्धता बनाए रखने के लिए पूज्य गुरुजी के दिशा–निर्देश
- साधना विधि की शुद्धता हर स्थिति में बनाए रखी जाए, उसमें किसी प्रकार की मिलावट न हो।
- विपश्यना सिखाने के लिए आचार्यगण कोई मानदेय नहीं लेंगे।
- विपश्यना सिखाने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
- रंग, जाति, लिंग, भाषा, सम्प्रदाय, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर कोई भेद–भाव नहीं होगा।
- आचार्यगण पत्नी/पति के अलावा सभी साधक/साधिकाओं को बेटे/बेटी के रूप में मानेंगे।
- विपश्यना केन्द्रों का उपयोग केवल विपश्यना साधना के लिए ही किया जाए, अन्य किसी गतिविधि के लिए नहीं। केन्द्रों का उपयोग पालि भाषा सिखाने के लिए भी नहीं किया जाएगा।
To serve at Dhamma Ketu, apply for Dhamma service from the course schedule or call the centre: 99077 55013, 99813 60654.
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